सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हिमाचल प्रदेश सरकार को पूर्व और मौजूदा सांसदों के खिलाफ 39 आपराधिक मामलों में अभियोजन वापस लेने की अनुमति दी, यह देखते हुए कि ये मामले राजनेताओं द्वारा कोविड-19 महामारी के दौरान विरोध प्रदर्शन करने से जुड़े थे।

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने कहा, “किसी भी मामले में कोई गंभीर या जघन्य अपराध नहीं दिखता है और न ही कोई दूर-दूर तक संकेत मिलता है कि आरोपी कठोर अपराधी हैं या बार-बार अपराध में शामिल हुए हैं।”
शीर्ष अदालत ने कहा, “इन मामलों में अभियोजन जारी रखने से न्याय प्रशासन का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। दूसरी ओर, यह अन्य गंभीर मामलों में मुकदमे की प्रगति को धीमा कर देगा, जिन पर अदालतों द्वारा अंतिम निर्णय लेने की उम्मीद की जाती है।”
राज्य सरकार ने शुरू में पार्टी लाइनों से परे विधायकों के खिलाफ 65 आपराधिक मामलों को बंद करने की अनुमति मांगने के लिए हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय से संपर्क किया था। 16 अप्रैल, 2024 को अपने फैसले में, उच्च न्यायालय ने राज्य को केवल 15 मामलों में अभियोजन वापस लेने की अनुमति दी। उच्च न्यायालय में आवेदन के लंबित रहने के दौरान ट्रायल कोर्ट ने पांच और मामलों का फैसला किया, जिससे 45 मामले शेष रह गए।
सुप्रीम कोर्ट के 10 अगस्त, 2021 के फैसले के संदर्भ में उच्च न्यायालय की मंजूरी आवश्यक थी, जिसने राज्य सरकारों को विधायकों/सांसदों के खिलाफ मामले वापस लेने के लिए उच्च न्यायालय की मंजूरी लेने का आदेश दिया था। शीर्ष अदालत द्वारा यह सुनिश्चित करने के लिए पेश की गई यह एक अनूठी आवश्यकता थी कि सरकारें आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत अभियोजन वापस लेने की अपनी शक्ति का दुरुपयोग न करें।
शीर्ष अदालत में कार्यवाही के दौरान, राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता (एएजी) वैभव श्रीवास्तव ने पीठ को बताया कि, प्रभावी रूप से, 45 में से केवल 39 मामले ही बचे हैं, क्योंकि छह और मामलों में सुनवाई समाप्त हो गई है और आरोपियों को या तो बरी कर दिया गया है या आरोपमुक्त कर दिया गया है।
अपने फैसले में, तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने बुधवार को कहा कि 65 मामले मुख्य रूप से कोविड-19 महामारी के दौरान चार शीर्षकों के तहत दर्ज किए गए थे: भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 269 के तहत मामले जो संक्रमण फैलने की संभावना वाले कृत्यों से संबंधित हैं; आईपीसी की धारा 352 लोक सेवकों के खिलाफ हमले या आपराधिक बल से संबंधित है, जिसमें किसी चोट या हमले का एक भी मामला दर्ज नहीं किया गया है; राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत शांति भंग करने और आपराधिक धमकी देने और धरना देने से संबंधित धारा 504 और 506; और आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 51 जहां जन प्रतिनिधियों ने सार्वजनिक स्थानों पर पुतला जलाया।
पीठ ने कहा, “इन प्राथमिकियों में आरोपों पर गौर करने पर, हम पाते हैं कि सभी घटनाएं कोविड-19 महामारी की अवधि से संबंधित हैं, जो अप्रत्याशित परिस्थितियों के साथ एक असाधारण स्थिति थी, जहां जन प्रतिनिधियों सहित लोग अलग-अलग तरीके से संकट में थे।”
अपने 2024 के फैसले में, उच्च न्यायालय ने कहा कि कुछ मामलों में, जिला वकीलों ने वापसी के लिए सहमति नहीं दी थी। उच्च न्यायालय ने शीर्ष अदालत के अगस्त 2021 के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि सरकारी अभियोजक को उच्च न्यायालय में आवेदन करने से पहले अभियोजन वापस लेने के लिए एक स्वतंत्र राय बनानी चाहिए। इसमें कहा गया कि राज्य सरकार इस शर्त को पूरा नहीं करती है।








